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mahabharat 13.99.d110: इसलिए जो भी अपना कल्याण चाहता है, उसे शुभ कर्म ही करने चाहिए। अशुभ कर्मों का त्याग कर देना चाहिए। ऐसा करने से उसे शुभ फल ही प्राप्त होंगे।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d110
 
 
श्लोक  13.99.d110 
तथा शुभसमाचारो ह्यशुभानि विवर्जयेत्॥
शुभान्येव समादद्याद् य इच्छेद् भूतिमात्मन:।
 
 
अनुवाद
इसलिए जो भी अपना कल्याण चाहता है, उसे शुभ कर्म ही करने चाहिए। अशुभ कर्मों का त्याग कर देना चाहिए। ऐसा करने से उसे शुभ फल ही प्राप्त होंगे।
 
Therefore, whoever wants his welfare should perform only auspicious deeds. Give up inauspicious deeds. By doing this, he will get only auspicious results.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)