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mahabharat 13.99.d107: इस प्रकार, जैसे पक्षी अपना घोंसला छोड़ देता है, वैसे ही भिक्षु भी इस शरीर को यहीं छोड़कर, ज्ञान की अग्नि में अपने समस्त पापों को जलाकर निर्वाण - मोक्ष प्राप्त कर लेता है।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d107
 
 
श्लोक  13.99.d107 
एवं स भिक्षुर्निर्वाणं प्राप्नुयाद् दग्धकिल्बिष:॥
इहस्थो देहमुत्सृज्य नीडं शकुनिवद् यथा।
 
 
अनुवाद
इस प्रकार, जैसे पक्षी अपना घोंसला छोड़ देता है, वैसे ही भिक्षु भी इस शरीर को यहीं छोड़कर, ज्ञान की अग्नि में अपने समस्त पापों को जलाकर निर्वाण - मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
 
In this way, like a bird leaving its nest, the bhikshu, leaving this body here itself, attains nirvana - liberation by burning all his sins in the fire of knowledge.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)