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mahabharat 13.99.d103: इस प्रकार विधिपूर्वक यतिधर्म का पालन करने वाला संन्यासी काल के फलस्वरूप पके फल के समान अपना शरीर त्यागकर सनातन ब्रह्म में प्रवेश कर जाता है।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d103
 
 
श्लोक  13.99.d103 
एवं संचरमाणस्तु यतिधर्मं यथाविधि।
कालस्य परिणामात् तु यथा पक्वफलं तथा॥
स विसृज्य स्वकं देहं प्रविशेद् ब्रह्म शाश्वतम्।
 
 
अनुवाद
इस प्रकार विधिपूर्वक यतिधर्म का पालन करने वाला संन्यासी काल के फलस्वरूप पके फल के समान अपना शरीर त्यागकर सनातन ब्रह्म में प्रवेश कर जाता है।
 
In this way, a Sanyasi who follows Yatidharma methodically, as a result of time, leaves his body like a ripe fruit and enters into eternal Brahma.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)