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mahabharat 13.99.d102: वस्तुओं के स्वरूप का विचार करके उनका सार जान लो। सदैव सत्य परायण रहो। अपने से ऊपर, नीचे या आस-पास किसी वस्तु की इच्छा मत करो।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d102
 
 
श्लोक  13.99.d102 
परिसंख्यानतत्त्वज्ञस्तथा सत्यरति: सदा।
ऊर्ध्वं नाधो न तिर्यक् च न किंचिदभिकामयेत्॥
 
 
अनुवाद
वस्तुओं के स्वरूप का विचार करके उनका सार जान लो। सदैव सत्य परायण रहो। अपने से ऊपर, नीचे या आस-पास किसी वस्तु की इच्छा मत करो।
 
Know the essence of things by thinking about their nature. Always remain devoted to truth. Do not desire anything above, below or around you.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)