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mahabharat 13.99.d100: सम्मान हो या अपमान, दोनों ही स्थितियों में उसे एक समान रहना चाहिए। मिट्टी, पत्थर और सोने के ढेले को एक समान समझना चाहिए। सभी प्राणियों को निर्भय बनाना चाहिए और सभी को निर्भयता की दक्षिणा देनी चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d100
 
 
श्लोक  13.99.d100 
समो मानापमानाभ्यां समलोष्टाश्मकाञ्चन:।
सर्वभूताभयकरस्तथैवाभयदक्षिण:॥
 
 
अनुवाद
सम्मान हो या अपमान, दोनों ही स्थितियों में उसे एक समान रहना चाहिए। मिट्टी, पत्थर और सोने के ढेले को एक समान समझना चाहिए। सभी प्राणियों को निर्भय बनाना चाहिए और सभी को निर्भयता की दक्षिणा देनी चाहिए।
 
Be it respect or insult, he should remain the same in both situations. He should consider lumps of mud, stones and gold to be the same. He should make all creatures fearless and give everyone the dakshina of fearlessness.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)