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mahabharat 13.98.20-21: महाबाहो! भरतनन्दन! जो पुरुष कठोर व्रत का पालन करने वाले तथा जलते हुए पैरों वाले ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह मृत्यु के बाद देवताओं द्वारा पूजित लोकों में जाता है और गोलोक में बड़े सुख से निवास करता है।   |   mahabharat अध्याय 13.98: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानकी प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.98.20-21 
दह्यमानाय विप्राय य: प्रयच्छत्युपानहौ।
स्नातकाय महाबाहो संशिताय द्विजातये॥ २०॥
सोऽपि लोकानवाप्नोति दैवतैरभिपूजितान्।
गोलोके स मुदा युक्तो वसति प्रेत्य भारत॥ २१॥
 
 
अनुवाद
महाबाहो! भरतनन्दन! जो पुरुष कठोर व्रत का पालन करने वाले तथा जलते हुए पैरों वाले ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह मृत्यु के बाद देवताओं द्वारा पूजित लोकों में जाता है और गोलोक में बड़े सुख से निवास करता है।
 
Mahabaho! Bharatanandan! He who donates shoes to a Brahmin who is a strict follower of strict vows and whose feet are burning, after death he goes to the worlds worshipped by the gods and lives in Golok with great happiness.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)