श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 98: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानकी प्रशंसा  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  13.98.19 
स शक्रलोके वसति पूज्यमानो द्विजातिभि:।
अप्सरोभिश्च सततं देवैश्च भरतर्षभ॥ १९॥
 
 
अनुवाद
हे भारतभूषण! वे देवताओं, ब्राह्मणों और अप्सराओं द्वारा निरन्तर सम्मानित होकर इन्द्रलोक में निवास करते हैं॥19॥
 
O Bharatbhushan! He resides in the Indraloka, being constantly honoured by the gods, brahmins and nymphs.॥ 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)