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श्री महाभारत
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पर्व 13: अनुशासन पर्व
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अध्याय 98: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानकी प्रशंसा
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श्लोक 18
श्लोक
13.98.18
छत्रं हि भरतश्रेष्ठ य: प्रदद्याद् द्विजातये।
शुभ्रं शतशलाकं वै स प्रेत्य सुखमेधते॥ १८॥
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! जो मनुष्य ब्राह्मण को सौ आरों वाला सुन्दर छत्र दान करता है, वह परलोक में सुख प्राप्त करता है।
O best of the Bharatas! He who donates a beautiful umbrella with a hundred spokes to a Brahmin, attains happiness in the next world.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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