श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 98: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानकी प्रशंसा  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  13.98.11 
भवेत् स गुरुतल्पी च ब्रह्महा च स वै भवेत्।
सुरापानं स कुर्याच्च यो हन्याच्छरणागतम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
जो शरणागत मनुष्य का वध करता है, वह गुरुपत्नी के साथ व्यभिचार, ब्राह्मणहत्या और मद्यपान आदि पापों का भागी होता है। ॥11॥
 
He who kills a person who has sought refuge in a refugee commits the sins of adultery with the wife of his guru, murder of a brahmin, and drinking alcohol.' ॥11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)