श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 97: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप  »  श्लोक 8-9h
 
 
श्लोक  13.97.8-9h 
अथ तेन स शब्देन ज्यायाश्चैव शरस्य च॥ ८॥
प्रहृष्ट: सम्प्रचिक्षेप सा च प्रत्याजहार तान्।
 
 
अनुवाद
धनुष की टंकार और छूटते बाणों की फुफकार सुनकर जमदग्नि ऋषि प्रसन्न हो जाते थे। इसलिए वे बार-बार बाण चलाते और रेणुका दूर से ही उन्हें उठाकर ले आतीं।
 
The twanging sound of the bowstring and the hissing sound of the arrows being released delighted the sage Jamadagni. So he would shoot arrows again and again and Renuka would pick them up from far away and bring them back. 8 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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