श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 97: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  13.97.4 
भीष्म उवाच
शृणु राजन्नवहितश्छत्रोपानहविस्तरम्।
यथैतत् प्रथितं लोके यथा चैतत् प्रवर्तितम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
भीष्म बोले, "हे राजन! मैं तुम्हें छाते और जूतों की उत्पत्ति के विषय में विस्तार से बता रहा हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो। संसार में इन दानों का प्रारम्भ किस प्रकार हुआ और इनका प्रसार किस प्रकार हुआ। यह सब सुनो।"
 
Bhishma said, "O King! I am telling you in detail about the origin of umbrellas and shoes. Listen carefully. How these donations started in the world and how they were spread. Listen to all this.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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