Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.97.28: विप्रवर! ब्रह्मर्षि! जो कुछ मैंने कहा है, वह आप भी जानते हैं। अच्छा, सूर्य को नष्ट करने से आपको क्या लाभ होगा? अतः मैं प्रार्थना करके आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ (कृपया सूर्य को नष्ट करने का अपना संकल्प त्याग दें)॥28॥ | mahabharat अध्याय 13.97: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
सर्वं हि वेत्थ विप्र त्वं यदेतत् कीर्तितं मया।
प्रसादये त्वां विप्रर्षे किं ते सूर्यं निपात्य वै॥ २८॥
अनुवाद
विप्रवर! ब्रह्मर्षि! जो कुछ मैंने कहा है, वह आप भी जानते हैं। अच्छा, सूर्य को नष्ट करने से आपको क्या लाभ होगा? अतः मैं प्रार्थना करके आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ (कृपया सूर्य को नष्ट करने का अपना संकल्प त्याग दें)॥28॥
‘Vipravara! Brahmarshi! You also know everything that I have said. Well, what will you gain by bringing down the Sun? Therefore, I want to please you with prayer (please give up your resolve to destroy the Sun)’॥ 28॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि छत्रोपानहोत्पत्तिर्नाम पञ्चनवतितमोऽध्याय:॥ ९५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें छत्र और उपानहकी उत्पत्ति नामक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९५॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥