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mahabharat 13.97.25-26: ‘जातकर्म, व्रत, उपनयन, विवाह, गोदान, यज्ञ, संपत्ति, शास्त्रीय दान, संयोग और धन-संग्रह आदि सभी कार्य अन्न से ही संपन्न होते हैं। भृगुनन्दन! आप भी इसे भली-भाँति जानते हैं। 25-26॥   |   mahabharat अध्याय 13.97: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 97: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  13.97.25-26 
जातकर्माणि सर्वाणि व्रतोपनयनानि च।
गोदानानि विवाहाश्च तथा यज्ञसमृद्धय:॥ २५॥
शास्त्राणि दानानि तथा संयोगा वित्तसंचया:।
अन्नत: सम्प्रवर्तन्ते तथा त्वं वेत्थ भार्गव॥ २६॥
 
 
अनुवाद
‘जातकर्म, व्रत, उपनयन, विवाह, गोदान, यज्ञ, संपत्ति, शास्त्रीय दान, संयोग और धन-संग्रह आदि सभी कार्य अन्न से ही संपन्न होते हैं। भृगुनन्दन! आप भी इसे भली-भाँति जानते हैं। 25-26॥
 
‘Jatkarma, fasting, Upanayana, marriage, Godan, Yagya property, classical donation, coincidence and collection of wealth etc. all the works are accomplished with food only. Bhrigunandan! You also know this very well. 25-26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)