श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 97: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  13.97.22 
ततोऽन्नं जायते विप्र मनुष्याणां सुखावहम्।
अन्नं प्राणा इति यथा वेदेषु परिपठ्यते॥ २२॥
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मण! उसी वर्षा से अन्न उत्पन्न होता है, जो मनुष्यों के लिए सुखदायक है। अन्न ही जीवन है, यह बात वेदों में भी कही गई है।
 
‘O Brahmin! It is from that rain that food is produced, which is soothing for humans. Food is life, this fact has been told in the Vedas as well.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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