श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 97: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  13.97.21 
आदत्ते रश्मिभि: सूर्यो दिवि तिष्ठंस्ततस्तत:।
रसं हृतं वै वर्षासु प्रवर्षति दिवाकर:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
‘सूर्यदेव आकाश में स्थित होकर अपनी किरणों से पृथ्वी का रस खींचते हैं और वर्षा ऋतु में उसे पुनः बरसा देते हैं।
 
‘The Sun God, being situated in the sky, draws the juice of the earth with his rays and rains it down again during the rainy season.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd