श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 97: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  13.97.19 
भीष्म उवाच
स विस्फार्य धनुर्दिव्यं गृहीत्वा च शरान् बहून्।
अतिष्ठत् सूर्यमभितो या तो याति ततो मुख:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं- युधिष्ठिर! ऐसा कहकर महर्षि जमदग्नि ने अपने दिव्य धनुष की डोरी खींची और हाथ में अनेक बाण लेकर सूर्य के सम्मुख खड़े हो गए। उन्होंने अपना मुख भी उसी दिशा में कर लिया, जिस दिशा में सूर्य गति कर रहा था।
 
Bhishmaji says- Yudhishthira! Saying this, Maharishi Jamadagni pulled the string of his divine bow and stood facing the Sun with many arrows in his hand. He also turned his face in the direction in which the Sun was moving.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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