श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 97: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  13.97.18 
जमदग्निरुवाच
अद्यैनं दीप्तकिरणं रेणुके तव दु:खदम्।
शरैर्निपातयिष्यामि सूर्यमस्त्राग्नितेजसा॥ १८॥
 
 
अनुवाद
जमदग्नि ने कहा, "रेणु! आज मैं अपने बाणों के तेज और शस्त्रों के बल से उस प्रज्वलित सूर्य को, जिसने तुम्हें पीड़ा पहुँचाई है, नीचे गिरा दूँगा।"
 
Jamadagni said, "Renu! Today I shall bring down the blazing sun, who has caused you pain, with the brilliance of my arrows and the power of my weapons."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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