श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 97: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  13.97.17 
एतस्मात् कारणाद् ब्रह्मंश्चिरायैतत् कृतं मया।
एतच्छ्रुत्वा मम विभो मा क्रुधस्त्वं तपोधन॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मन्! इसी कारण मैंने आपका कार्य कुछ विलम्ब से पूरा किया है। हे तपधान! प्रभु! कृपया मेरी इस बात पर ध्यान दीजिए और क्रोध न कीजिए।॥17॥
 
O Brahman! This is the reason why I have completed your work a little late. O Tapadhan! Prabhu! Please pay attention to this point of mine and do not get angry. ॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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