श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 97: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  13.97.16 
रेणुकोवाच
शिरस्तावत् प्रदीप्तं मे पादौ चैव तपोधन।
सूर्यतेजोनिरुद्धाहं वृक्षच्छायां समाश्रिता॥ १६॥
 
 
अनुवाद
रेणुका बोलीं - "तपोधन! मेरा सिर तप रहा था, दोनों पैर जलने लगे थे और सूर्य की प्रचण्ड गर्मी मुझे आगे बढ़ने से रोक रही थी। इसलिए मैंने थोड़ी देर एक वृक्ष की छाया में खड़े होकर विश्राम किया।"
 
Renuka said - Tapodhan! My head got heated up, both legs started burning and the intense heat of the sun prevented me from moving forward. That is why I stood in the shade of a tree for a while and took rest. 16.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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