श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 97: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  13.97.15 
स तामृषिस्तदा क्रुद्धो वाक्यमाह शुभाननाम्।
रेणुके किं चिरेण त्वमागतेति पुन: पुन:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
उस समय ऋषि क्रोधित होकर अपनी सुन्दरी पत्नी से बार-बार पूछने लगे - 'रेणुका! तुमने आने में इतना विलम्ब क्यों किया?'॥15॥
 
At that time the sage became angry and started asking his beautiful wife repeatedly - 'Renuka! Why did you take so long to come?'॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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