श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 97: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  13.97.13-14 
प्रत्याजगाम च शरांस्तानादाय यशस्विनी॥ १३॥
सा वै खिन्ना सुचार्वंगी पद्‍भ्यां दु:खं नियच्छती।
उपाजगाम भर्तारं भयाद् भर्तु: प्रवेपती॥ १४॥
 
 
अनुवाद
सुन्दर शरीर वाली और यशस्वी रेणुका जब उन बाणों को लेकर लौटीं, तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ। वे किसी प्रकार अपने पैरों की जलन सहन करती हुईं अपने पति के भय से काँपती हुई उनके पास आईं।
 
When Renuka, who had beautiful body parts and was famous, returned with those arrows, she was very sad. She somehow endured the pain caused by burning of her feet and came to him trembling in fear of her husband.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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