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mahabharat 13.97.11-12h: रेणुका, वह गर्वीली स्त्री, वृक्षों के बीच से होकर उनकी छाया में आश्रय लेकर चलती थी, और बीच-बीच में रुक जाती थी, क्योंकि उसका सिर और पैर जल रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 13.97: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 97: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप  »  श्लोक 11-12h
 
 
श्लोक  13.97.11-12h 
सा गच्छन्त्यन्तरा छायां वृक्षमाश्रित्य भामिनी॥ ११॥
तस्थौ तस्या हि सन्तप्तं शिर: पादौ तथैव च।
 
 
अनुवाद
रेणुका, वह गर्वीली स्त्री, वृक्षों के बीच से होकर उनकी छाया में आश्रय लेकर चलती थी, और बीच-बीच में रुक जाती थी, क्योंकि उसका सिर और पैर जल रहे थे।
 
Renuka, the proud woman, used to walk through the trees, taking shelter in their shade, and would stop in between because her head and feet were burning. 11 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)