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mahabharat 13.96.52: जो मनुष्य प्रत्येक पर्व पर एकाग्रचित्त होकर इस पवित्र कथा का पाठ करता है, उसके पुत्र कभी मूर्ख नहीं होते, न ही उसके शरीर का कोई अंग नष्ट होता है और न ही उसकी कामनाएं कभी विफल होती हैं ॥ 52॥   |   mahabharat अध्याय 13.96: ब्रह्मसरतीर्थमें अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंकी धर्मोपदेशपूर्ण शपथ तथा धर्मज्ञानके उद्देश्यसे चुराये हुए कमलोंका वापस देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 96: ब्रह्मसरतीर्थमें अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंकी धर्मोपदेशपूर्ण शपथ तथा धर्मज्ञानके उद्देश्यसे चुराये हुए कमलोंका वापस देना  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  13.96.52 
आख्यानं य इदं युक्त: पठेत् पर्वणि पर्वणि।
न मूर्खं जनयेत् पुत्रं न भवेच्च निराकृति:॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य प्रत्येक पर्व पर एकाग्रचित्त होकर इस पवित्र कथा का पाठ करता है, उसके पुत्र कभी मूर्ख नहीं होते, न ही उसके शरीर का कोई अंग नष्ट होता है और न ही उसकी कामनाएं कभी विफल होती हैं ॥ 52॥
 
He who recites this sacred story with full concentration on every festival never gives birth to a foolish son and never becomes lacking in any body part or fails in his wishes. ॥ 52॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)