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mahabharat 13.96.50: महेन्द्र के ऐसा कहने पर क्रोधित तपस्वी एवं बुद्धिमान अगस्त्य ऋषि अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने इन्द्र के हाथ से अपना कमल ले लिया ॥50॥   |   mahabharat अध्याय 13.96: ब्रह्मसरतीर्थमें अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंकी धर्मोपदेशपूर्ण शपथ तथा धर्मज्ञानके उद्देश्यसे चुराये हुए कमलोंका वापस देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 96: ब्रह्मसरतीर्थमें अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंकी धर्मोपदेशपूर्ण शपथ तथा धर्मज्ञानके उद्देश्यसे चुराये हुए कमलोंका वापस देना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  13.96.50 
इत्युक्त: स महेन्द्रेण तपस्वी कोपनो भृशम्।
जग्राह पुष्करं धीमान् प्रसन्नश्चाभवन्मुनि:॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
महेन्द्र के ऐसा कहने पर क्रोधित तपस्वी एवं बुद्धिमान अगस्त्य ऋषि अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने इन्द्र के हाथ से अपना कमल ले लिया ॥50॥
 
When Mahendra said this, the angry ascetic and wise sage Agastya became very happy and he took his lotus from Indra's hand. 50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)