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mahabharat 13.96.43: राजन! ब्रह्मर्षियों, देवर्षियों और राजर्षियों में क्रुद्ध हुए महर्षि अगस्त्य को संबोधित करके देवराज इन्द्र ने जो अपना अभिप्राय प्रकट किया, उसे आज मेरे मुख से सुनिए॥43॥   |   mahabharat अध्याय 13.96: ब्रह्मसरतीर्थमें अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंकी धर्मोपदेशपूर्ण शपथ तथा धर्मज्ञानके उद्देश्यसे चुराये हुए कमलोंका वापस देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 96: ब्रह्मसरतीर्थमें अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंकी धर्मोपदेशपूर्ण शपथ तथा धर्मज्ञानके उद्देश्यसे चुराये हुए कमलोंका वापस देना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  13.96.43 
अथाब्रवीन्मघवा प्रत्ययं स्वं
समाभाष्य तमृषिं जातरोषम्।
ब्रह्मर्षिर्देवर्षिनृपर्षिमध्ये
यं तं निबोधेह ममाद्य राजन्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
राजन! ब्रह्मर्षियों, देवर्षियों और राजर्षियों में क्रुद्ध हुए महर्षि अगस्त्य को संबोधित करके देवराज इन्द्र ने जो अपना अभिप्राय प्रकट किया, उसे आज मेरे मुख से सुनिए॥43॥
 
Rajan! Listen here today from my mouth, what Devraj Indra expressed his intention by addressing Maharishi Agastya who was angry among Brahmarishis, Devarshis and Rajarishis. 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)