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mahabharat 13.96.15: पृथ्वीनाथ! तत्पश्चात् वे श्रेष्ठ ऋषिगण और राजागण वहाँ कुछ निश्चय करके इस धर्म का पालन करते हुए अपने पुत्र-पौत्रों सहित एक-एक करके शपथ लेने लगे॥15॥   |   mahabharat अध्याय 13.96: ब्रह्मसरतीर्थमें अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंकी धर्मोपदेशपूर्ण शपथ तथा धर्मज्ञानके उद्देश्यसे चुराये हुए कमलोंका वापस देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 96: ब्रह्मसरतीर्थमें अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंकी धर्मोपदेशपूर्ण शपथ तथा धर्मज्ञानके उद्देश्यसे चुराये हुए कमलोंका वापस देना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  13.96.15 
ते निश्चितास्तत्र महर्षयस्तु
सम्पश्यन्तो धर्ममेतं नरेन्द्रा:।
ततोऽशपन्त शपथान् पर्ययेण
सहैव ते पार्थिव पुत्रपौत्रै:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वीनाथ! तत्पश्चात् वे श्रेष्ठ ऋषिगण और राजागण वहाँ कुछ निश्चय करके इस धर्म का पालन करते हुए अपने पुत्र-पौत्रों सहित एक-एक करके शपथ लेने लगे॥15॥
 
Prithvinath! Thereafter, those great sages and kings, taking some decisions there and keeping an eye on this religion, along with their sons and grandsons, started taking oath one by one. 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)