श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक d2
 
 
श्लोक  13.95.d2 
(अत्रिरुवाच
न जातु काम: कामनामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥ )
 
 
अनुवाद
अत्रि बोले, 'भोगों की इच्छा उनके भोग से कभी तृप्त नहीं होती। बल्कि घी की आहुति देने पर प्रज्वलित होने वाली अग्नि की तरह वह बढ़ती ही रहती है।'
 
Atri said, 'The desire for pleasures is never satiated by their enjoyment. Rather, like the fire that blazes after the offering of ghee, it keeps on increasing.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)