श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक d1h-27
 
 
श्लोक  13.95.d1h-27 
वृषादर्भिरुवाच
(प्रतिग्रहो ब्राह्मणानां सृष्टा वृत्तिरनिन्दिता।)
प्रतिग्रहस्तारयति पुष्टिर्वै प्रतिगृह्यताम्।
मयि यद् विद्यते वित्तं तद् वृणुध्वं तपोधना:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
तब वृषदर्भि ने कहा—प्रतिग्रह ब्राह्मणों के लिए नियत सर्वोत्तम वृत्ति है। तपदान! प्रतिग्रह ब्राह्मणों को अकाल और भूख की पीड़ा से बचाता है और पोषण का सर्वोत्तम साधन है। अतः आप मेरे पास जो धन है, उसे स्वीकार करके ग्रहण करें॥ 27॥
 
Then Vrishadharbhi said—Pratigraha is the best profession fixed for Brahmins. Tapadhan! Pratigraha protects Brahmins from the pain of famine and hunger and is the best means of nourishment. Therefore, please accept and take the wealth that I have.॥ 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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