श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 97
 
 
श्लोक  13.95.97 
यातुधान्युवाच
नामनैरुक्तमेतत् ते दु:खव्याभाषिताक्षरम्।
नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम्॥ ९७॥
 
 
अनुवाद
यातुधानि ने कहा, "देवी! आपने जो नाम वर्णन किया है, उसका एक भी अक्षर उच्चारण करना मेरे लिए कठिन है, अतः मैं उसे स्मरण नहीं कर पा रहा हूँ। कृपया तालाब में प्रवेश करें।"
 
Yaatudhaani said, "Devi! It is difficult for me to pronounce even a single syllable of the description of your name given by you, hence I cannot remember it. Please enter the pond."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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