श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 96
 
 
श्लोक  13.95.96 
अरुन्धत्युवाच
धरान् धरित्रीं वसुधां भर्तुस्तिष्ठाम्यनन्तरम्।
मनोऽनुरुन्धती भर्तुरिति मां विद्धॺरुन्धतीम्॥ ९६॥
 
 
अनुवाद
अरुन्धती बोलीं- यातुधानि! मैं अपनी शक्ति से अरु अर्थात पर्वत, पृथ्वी और स्वर्ग को धारण करती हूँ। मैं अपने पति से कभी अलग नहीं रहती तथा उनकी इच्छानुसार कार्य करती हूँ, इसलिए मेरा नाम अरुन्धती है।
 
Arundhati said- Yaatudhaani! I hold Aru i.e. mountain, earth and heaven with my power. I never stay away from my husband and act according to his wishes, hence my name is Arundhati.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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