श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  13.95.93 
यातुधान्युवाच
नामनैरुक्तमेतत् ते दु:खव्याभाषिताक्षरम्।
नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम्॥ ९३॥
 
 
अनुवाद
यातुधानी बोली - महर्षि ! आपके नाम के वर्णन का एक अक्षर भी उच्चारण करना मेरे लिए कठिन है। इसे स्मरण रखना मेरे लिए असम्भव है। अतः जाइए, सरोवर में प्रवेश कीजिए ॥93॥
 
Yatudhani said – Maharishi! It is difficult for me to pronounce even one letter of the description of your name. It is impossible for me to remember this. So go, enter the lake. 93॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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