श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 90
 
 
श्लोक  13.95.90 
गौतम उवाच
गोदमो दमतोऽधूमोऽदमस्ते समदर्शनात्।
विद्धि मां गौतमं कृत्ये यातुधानि निबोध माम्॥ ९०॥
 
 
अनुवाद
गौतम बोले- मैंने 'गो' नामक इन्द्रियों को वश में कर लिया है, इसलिए मैं 'गोदाम' नाम धारण करता हूँ। मैं धूमरहित अग्नि के समान तेजस्वी हूँ, सब पर समदृष्टि रखने के कारण मैं आपके या किसी अन्य के द्वारा दबा हुआ नहीं हूँ। मेरे शरीर (गो) का तेज अंधकार (अतम) को दूर भगाता है, इसलिए आप मुझे गौतम ही समझें। 90।
 
Gautam said- I have controlled the senses called 'Go', therefore I take the name 'Godam'. I am as radiant as a smokeless fire, due to my equal sight towards all I cannot be suppressed by you or anyone else. The radiance of my body (Go) drives away darkness (Atam), therefore you should consider me as Gautam. 90.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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