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श्लोक 13.95.9  |
युधिष्ठिर उवाच
कथं सदोपवासी स्याद् ब्रह्मचारी च पार्थिव।
विघसाशी कथं च स्यात् कथं चैवातिथिप्रिय:॥ ९॥ |
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| अनुवाद |
| युधिष्ठिर ने पूछा- हे पृथ्वीराज! ब्राह्मण कैसे सदा व्रत रखकर ब्रह्मचारी रह सकता है? तथा वह विष का भक्त और अतिथिप्रिय कैसे हो सकता है?॥9॥ |
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| Yudhishthira asked-Lord of the Earth! How can a Brahmin fast always and remain celibate? And how can he be a devotee of poison and a lover of guests?॥9॥ |
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