श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  13.95.9 
युधिष्ठिर उवाच
कथं सदोपवासी स्याद् ब्रह्मचारी च पार्थिव।
विघसाशी कथं च स्यात् कथं चैवातिथिप्रिय:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा- हे पृथ्वीराज! ब्राह्मण कैसे सदा व्रत रखकर ब्रह्मचारी रह सकता है? तथा वह विष का भक्त और अतिथिप्रिय कैसे हो सकता है?॥9॥
 
Yudhishthira asked-Lord of the Earth! How can a Brahmin fast always and remain celibate? And how can he be a devotee of poison and a lover of guests?॥9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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