श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  13.95.87 
यातुधान्युवाच
यथोदाहृतमेतत् ते मयि नाम महाद्युते।
दुर्धार्यमेतन्मनसा गच्छावतर पद्मिनीम्॥ ८७॥
 
 
अनुवाद
यातुधानि ने कहा, "महर्षि! आपके नाम का अर्थ समझना मेरे लिए अत्यन्त कठिन है। आप भी कमलों से भरे हुए कूप के पास जाइये।" 87
 
Yaatudhaani said, "Maharshi! It is very difficult for me to understand the meaning of your name. You should also go to the well filled with lotuses." 87
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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