श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  13.95.86 
कश्यप उवाच
कुलं कुलं च कुवम: कुवम: कश्यपो द्विज:।
काश्य: काशनिकाशत्वादेतन्मे नाम धारय॥ ८६॥
 
 
अनुवाद
कश्यप बोले—यातुधानि! कश्य शरीर का नाम है, जो इसका पालन करता है, वह कश्यप है। मैं प्रत्येक कुल (शरीर) में अन्तर्यामी रूप से प्रवेश करता हूँ और उसकी रक्षा करता हूँ, इसीलिए मैं कश्यप हूँ। कु अर्थात् पृथ्वी पर वर्षा करने वाले सूर्य अर्थात् वाम भी मेरा ही रूप हैं, इसीलिए मुझे 'कुवम्' भी कहते हैं। मेरे शरीर का रंग कषाय के पुष्प के समान चमकीला है, इसलिए मैं कश्य नाम से भी प्रसिद्ध हूँ। यही मेरा नाम है। तुम इसे धारण करो। 86।
 
Kashyap said—Yaatudhaani! Kashya is the name of the body, the one who takes care of it is called Kashyap. I enter every clan (body) as Antaryami and protect it, that is why I am Kashyap. The Sun that rains on Ku i.e. earth i.e. Vam is also my form, that is why I am also called 'Kuvam'. The colour of my body is bright like the flower of the Kashaya, hence I am also famous by the name Kashya. This is my name. You should wear it. 86.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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