| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत » श्लोक 82 |
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| | | | श्लोक 13.95.82  | अत्रिरुवाच
अरात्रिरत्रि: सा रात्रिर्यां नाधीते त्रिरद्य वै।
अरात्रिरत्रिरित्येव नाम मे विद्धि शोभने॥ ८२॥ | | | | | | अनुवाद | | अत्रि बोले—कल्याणि! जो काम आदि शत्रुओं से रक्षा करती है, उसे अरात्रि कहते हैं और जो आत् (मृत्यु) से रक्षा करती है, उसे अत्रि कहते हैं। इस प्रकार मैं अत्रि हूँ, क्योंकि मैं अरात्रि हूँ। जब तक जीव को एकमात्र परमात्मा का ज्ञान नहीं हो जाता, तब तक वह अवस्था रात्रि कहलाती है। उस अज्ञान अवस्था से मुक्त होने के कारण मुझे अरात्रि और अत्रि भी कहते हैं। मैं उस रात्रि के समान परमात्मा में सदा जागती रहती हूँ, क्योंकि वह सब जीवों के लिए अज्ञात है; इसलिए वह मेरे लिए अरात्रि के समान है, इस व्युत्पत्ति के अनुसार भी मेरा नाम अरात्रि और अत्रि (बुद्धिमान) है। मेरे नाम का अर्थ इसी प्रकार समझो। | | | | Atri said—Kalyani! The one who saves from the enemies like Kaam etc. is called Aratri and the one who saves from At (death) is called Atri. In this way, I am Atri because I am Aratri. Till the time a living being does not get the knowledge of the only God, the state is called night. Being free from that state of ignorance, I am also called Aratri and Atri. I always remain awake in that Supreme Being which is like night because it is unknown to all living beings; hence it is like Aratri for me, according to this etymology also I bear the name Aratri and Atri (wise). Understand the meaning of my name as such. | | ✨ ai-generated | | |
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