श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  13.95.81 
भीष्म उवाच
विज्ञाय यातुधानीं तां कृत्यामृषिवधैषिणीम्।
अत्रि: क्षुधापरीतात्मा ततो वचनमब्रवीत्॥ ८१॥
 
 
अनुवाद
भीष्म कहते हैं - राजन! यह सुनकर महर्षि अत्रि समझ गए कि यह कोई राक्षसी कृत्य है और हम सब ऋषियों को मारने के उद्देश्य से यहाँ आया है। तथापि भूख से व्याकुल होकर उन्होंने इस प्रकार उत्तर दिया।
 
Bhishma says - King! On hearing this, Maharishi Atri understood that this is a demonic act and has come here with the intention of killing all of us sages. However, being troubled with hunger, he replied in this manner. 81.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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