श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  13.95.80 
यातुधान्युवाच
समयेन बिसानीतो गृह्णीध्वं कामकारत:।
एकैको नाम मे प्रोक्त्वा ततो गृह्णीत माचिरम्॥ ८०॥
 
 
अनुवाद
यातुधानि ने कहा - ऋषियों! आप इस सरोवर से जितने चाहें उतने मृणाल ले जा सकते हैं, बस एक शर्त है। एक-एक करके आओ और अपना नाम तथा उद्देश्य बताकर मृणाल ले जाओ। इसमें विलम्ब करने की कोई आवश्यकता नहीं है। 80.
 
Yaatudhaani said - Rishis! You can take as many Mrinals from this lake as you want on one condition. Come one by one and tell me your name and purpose and take the Mrinals. There is no need to delay in this. 80.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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