श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 79
 
 
श्लोक  13.95.79 
ऋषय ऊचु:
सर्व एव क्षुधार्ता: स्म न चान्यत् किंचिदस्ति न:।
भवत्या: सम्मते सर्वे गृह्णीयाम बिसान्युत॥ ७९॥
 
 
अनुवाद
ऋषि बोले, "भैया! इस समय हमें बहुत भूख लगी है और हमारे पास खाने के लिए और कुछ नहीं है। इसलिए यदि आपकी आज्ञा हो तो हम सब इस सरोवर से थोड़ा-थोड़ा मृणाल ग्रहण कर लें।"
 
The sage said, "Brother! At this time we are very hungry and we have nothing else to eat. So if you allow us, we will all take some Mrinal from this lake. 79.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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