श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  13.95.71 
कदाचिद् विचरन्तस्ते वृक्षैरविरलैर्वृताम्।
शुचिवारिप्रसन्नोदां ददृशु: पद्मिनीं शुभाम्॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
एक दिन भ्रमण करते हुए उन महर्षियों को एक सुन्दर सरोवर मिला, जिसका जल अत्यन्त स्वच्छ और निर्मल था। चारों ओर घने वृक्षों की पंक्ति शोभा बढ़ा रही थी।
 
One day, while wandering around, those great sages came across a beautiful lake; the water of which was very clean and pure. A row of dense trees was adorning its four sides.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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