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श्लोक 13.95.68  |
भीष्म उवाच
अथ दृष्ट्वा परिव्राट् स तान् महर्षीन् शुना सह।
अभिगम्य यथान्यायं पाणिस्पर्शमथाचरत्॥ ६८॥ |
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| अनुवाद |
| भीष्म कहते हैं - राजन! कुत्ते के साथ आये हुए तपस्वी ने जब उन महात्माओं को देखा, तो वह उनके पास आया और तप की मर्यादा के अनुसार उन्हें हाथ से स्पर्श किया। |
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| Bhishma says - King! When the ascetic who had come with the dog saw those great sages, he came near them and touched them with his hand according to the decorum of asceticism. |
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