श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  13.95.68 
भीष्म उवाच
अथ दृष्ट्वा परिव्राट् स तान् महर्षीन् शुना सह।
अभिगम्य यथान्यायं पाणिस्पर्शमथाचरत्॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
भीष्म कहते हैं - राजन! कुत्ते के साथ आये हुए तपस्वी ने जब उन महात्माओं को देखा, तो वह उनके पास आया और तप की मर्यादा के अनुसार उन्हें हाथ से स्पर्श किया।
 
Bhishma says - King! When the ascetic who had come with the dog saw those great sages, he came near them and touched them with his hand according to the decorum of asceticism.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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