श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  13.95.66 
भरद्वाज उवाच
नैतस्येह यथास्माकं ब्रह्मबन्धोरचेतस:।
शोको भार्यापवादेन तेन पीवाञ्छुना सह॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
भारद्वाज बोले, "यह अज्ञानी ब्राह्मण मित्र हमारी तरह अपनी पत्नी के अपमानित होने पर दुःखी नहीं है। इसीलिए तो कुत्ते के साथ मोटा हो गया है।"
 
Bharadwaj said, 'This Brahmin friend without any sense is not sad about his wife being disgraced like us. That is why he has become fat with the dog.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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