श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  13.95.65 
कश्यप उवाच
नैतस्येह यथास्माकं चत्वारश्च सहोदरा:।
देहि देहीति भिक्षन्ति तेन पीवाञ्छुना सह॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
कश्यप बोले, "हमारे चारों भाई प्रतिदिन हमसे भोजन मांगते हैं, 'हमें भोजन दो, हमें भोजन दो' कहते हैं। अर्थात् हमें बड़े परिवार के लिए भोजन और वस्त्र की चिंता करनी पड़ती है। इस संन्यासी को ऐसी कोई चिंता नहीं है। इसलिए यह कुत्ते के साथ मोटा हो गया है।" 65
 
Kasyapa said, "Our four brothers ask us for food every day, saying, 'Give us food, give us food'. That is, we have to worry about food and clothing for a large family. This sannyasi has no such worries. Therefore, he has grown fat along with the dog. 65.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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