श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  13.95.64 
जमदग्निरुवाच
नैतस्येह यथास्माकं भक्तमिन्धनमेव च।
संचिन्त्यं वार्षिकं चित्ते तेन पीवाञ्छुना सह॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
जमदग्नि ने कहा, 'हमारी तरह इसे पूरे वर्ष के लिए भोजन और ईंधन जुटाने की चिंता नहीं रहती, इसीलिए यह कुत्ते के साथ मोटा हो गया है।' 64
 
Jamadagni said, 'Unlike us, he is not worried about gathering food and fuel for the whole year, that is why he has become fat along with the dog.' 64
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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