श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  13.95.62 
अत्रिरुवाच
नैतस्येह यथास्माकं क्षुधा वीर्यं समाहतम्।
कृच्छ्राधीतं प्रणष्टं च तेन पीवाञ्छुना सह॥ ६२॥
 
 
अनुवाद
अत्रि ने कहा, 'उसने हमारी तरह भूख के कारण अपनी सारी शक्ति नहीं खोई है और न ही उसने हमारी तरह कठिन परिश्रम से अर्जित वेदों का सारा ज्ञान खोया है; इसीलिए वह कुत्ते के साथ मोटा हो गया है।'
 
Atri said, 'He has not lost all his strength due to hunger like we have and he has not lost all his hard-earned knowledge of the Vedas like we have; that is why he has grown fat along with the dog.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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