श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  13.95.61 
वसिष्ठ उवाच
नैतस्येह यथास्माकमग्निहोत्रमनिर्हुतम्।
सायं प्रातश्च होतव्यं तेन पीवाञ्छुना सह॥ ६१॥
 
 
अनुवाद
वशिष्ठ बोले, 'हमारी तरह उसे भी इस बात की चिंता नहीं है कि हमने आज अग्निहोत्र नहीं किया है और हमें सुबह-शाम अग्निहोत्र करना है; इसीलिए वह कुत्ते के साथ-साथ बहुत मोटा और स्वस्थ हो गया है।
 
Vasishtha said, 'Like us, he is not concerned about the fact that we have not performed Agnihotra today and we have to perform Agnihotra in the morning and evening; that is why he has become very fat and healthy along with the dog.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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