श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 6-8
 
 
श्लोक  13.95.6-8 
कुटुम्बिको धर्मकाम: सदास्वप्नश्च मानव:॥ ६॥
अमांसाशी सदा च स्यात् पवित्रं च सदा पठेत्।
ऋतवादी सदा च स्यान्नियतश्च सदा भवेत् ॥ ७॥
विघसाशी कथं च स्याद् सदा चैवातिथिप्रिय:।
अमृताशी सदा च स्यात् पवित्री च सदा भवेत् ॥ ८॥
 
 
अनुवाद
उसे धर्मपालन की इच्छा से ही (कामभोग के लिए नहीं) स्त्री आदि कुटुम्ब का संग्रह करना चाहिए। ब्राह्मण के लिए उचित है कि वह सदैव जागृत रहे, मांसाहार न करे, सदा पवित्रता से वेदों का पाठ करे, सदा सत्य बोले और इन्द्रियों को वश में रखे। उसे सदैव अमृताशी, विघ्नशी, अतिथि-सत्कार करने वाला और सदा पवित्र रहना चाहिए। 6-8॥
 
He should collect women etc. family only with the desire of following the religion (not for sexual enjoyment). It is proper for a Brahmin to always remain alert, never eat meat, always recite the Vedas with purity, always speak the truth and keep the senses under control. He should always remain amritashi, vighsashi, hospitable and always pure. 6-8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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