श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  13.95.58 
भीष्म उवाच
अथात्रिप्रमुखा राजन् वने तस्मिन् महर्षय:।
व्यचरन् भक्षयन्तो वै मूलानि च फलानि च॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
भीष्म कहते हैं - राजन! उन दिनों अत्रि आदि महान ऋषिगण उस वन में कंद-मूल और फल खाते हुए विचरण करते थे।
 
Bhishma says - King! In those days, great sages like Atri used to roam around in that forest, eating roots and fruits.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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