vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 13: अनुशासन पर्व
»
अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत
»
श्लोक 57
श्लोक
13.95.57
सा तथेति प्रतिश्रुत्य यातुधानी स्वरूपिणी।
जगाम तद् वनं यत्र विचेरुस्ते महर्षय:॥ ५७॥
अनुवाद
राजा की यह आज्ञा पाकर यातुधानि ने ‘तथास्तु’ कहकर उसे स्वीकार किया और उस वन में चले गए जहाँ महामुनि विचरण करते थे ॥57॥
On receiving this command from the king, Yaatudhaani accepted it saying 'Tathastu' and went to the forest where the great sage used to roam. ॥57॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×