श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  13.95.57 
सा तथेति प्रतिश्रुत्य यातुधानी स्वरूपिणी।
जगाम तद् वनं यत्र विचेरुस्ते महर्षय:॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
राजा की यह आज्ञा पाकर यातुधानि ने ‘तथास्तु’ कहकर उसे स्वीकार किया और उस वन में चले गए जहाँ महामुनि विचरण करते थे ॥57॥
 
On receiving this command from the king, Yaatudhaani accepted it saying 'Tathastu' and went to the forest where the great sage used to roam. ॥57॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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