श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 55-56
 
 
श्लोक  13.95.55-56 
वृषादर्भिरुवाच
ऋषीणां गच्छ सप्तानामरुन्धत्यास्तथैव च।
दासीभर्तुश्च दास्याश्च मनसा नाम धारय॥ ५५॥
ज्ञात्वा नामानि चैवैषां सर्वानेतान् विनाशय।
विनष्टेषु तथा स्वैरं गच्छ यत्रेप्सितं तव॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
वृषदर्भि ने कहा, "यातुधानि! तुम यहाँ से वन में जाकर अरुन्धती, उनकी दासी और उस दासी के पति सहित सप्त ऋषियों के नाम पूछो और उनका अर्थ मन में स्मरण करो। इस प्रकार उनके नामों का अर्थ समझकर उनका वध करो; तत्पश्चात् जहाँ चाहो वहाँ चले जाओ।" 55-56.
 
Vrishadharbhi said, "Yaatudhaani! Go to the forest from here and ask the names of the seven sages including Arundhati, their maidservant and the husband of that maidservant and remember their meanings in your mind. Thus, after understanding the meaning of their names, kill them; after that go wherever you wish." 55-56.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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